कहानी नफीसा की

यह कहानी है नफीसा की। एक ऐसी गरीब लड़की की जो अपने बीमार बाप और अम्मी के लिए नवाब के कारखाने में कपड़े सिलने का काम करती है। रोज मेहनत करती है, घर चलाती है। लेकिन उसकी जिंदगी में एक तूफान आता है। कारखाने के मालिक का बेटा एक अय्याशी और शराबी लड़का उसे रोज परेशान करता है। काम करते वक्त नजरों से या घर जाते हुए रास्ते में रोक कर वो उसे जबरदस्ती शादी के लिए मजबूर करता है। उसकी जिंदगी को मुश्किलों से भर देता है। क्या नफीसा इन सब परेशानियों से बच पाएगी? क्या उसकी दीनदारी और सब्र उसे जीत दिलाएगा? यह जानने के लिए पूरी कहानी जरूर देखें। शहर के किनारे पर जहां अमीरी की चमक हर तरफ फैली हुई थी, एक आलीशान महल उभरा हुआ था। यह अब्दुल रहमान का घर था। एक मशहूर ताजर, जो कपड़ों और कालीन के कारोबार से, अपनी दौलत के सिलसिले को आसमान तक पहुंचा चुका था। उसका घर इतना बड़ा और शानदार था कि लोगों की जुबान पर शीश महल का नाम था। दीवारों पर नक्शी काम जड़े हुए थे। जिनमें चमकते हुए शीशे और सोने के पत्ते लगे हुए थे जो सूरज की किरणों से जगमगाते थे। अंदर मार्बल के फर्श पर मुलायम कालीन बिछे हुए थे। जिनके ऊपर से चलना जिसे बादलों पर चलना हो। हर कमरा एक अलग जहान था। बड़े-बड़े दरवाजे जो टीक की लकड़ी से बने थे उन पर नक्काशी की गई थी। फर्नीचर जो विदेशी मुल्कों से मंगाया गया था और झूमर जो रात को चांदनी की तरह रोशनी बिखेरते थे। घर के पीछे एक बाग था जहां मोर अपने पंख फैलाकर नाचते थे। फव्वारे पानी की धुन बजाते थे और फूलों की खुशबू हवा में घुली हुई थी। अब्दुल रहमान के पास इतनी दौलत थी कि शहर के लोग उसकी मिसाल देते थे। उसके कारखाने में सैकड़ों मजदूर रोज काम करते। उनकी मेहनत से उसका कारोबार रोज बढ़ता जाता था। वो एक नेक दिल इंसान था जो हर जुम्मे को मस्जिद में नमाज पढ़ता और गरीबों को सदका बांटता। लेकिन उसका बेटा अमार उसकी उम्मीदों पर खरा नहीं उतर रहा था। अब्दुल रहमान की बीवी अमार की अम्मी एक खुशमिजाज औरत थी जो घर के हर नौकर को संभालती, खाना पकाती और बच्चों को प्यार से संभालती। उनके दो बच्चे थे। अमार, एक जवान लड़का जो दुनिया की हर खुशी को हाथ में पकड़े हुए था। लेकिन उसकी जिंदगी अय्याशी की गर्दाब में डूबी हुई थी। और उसकी छोटी बहन आलिया जो हमेशा अपने भाई के साथ हंसीज़ाक करती और उससे प्यार करती थी। रहती अपनी अम्मी की मदद करती और कभी कभार बाग में फूलों के साथ खेलती। अमार का मिजाज अलग था। वो अपने दोस्तों के साथ दिन रात अय्याशी में मशगूल रहता। शराब के मजलिस जहां रात भर गाने और नाच होते। शहर की गलियों में घोड़े पर तेजी से दौड़ना और हर वो चीज जो उसके दिल को बहलाती। उसके दोस्त भी उसी किस्म के थे। अमीर घराने के बिगड़े हुए नौजवान जो जिंदगी को एक लंबी महफिल समझते थे। अमार सुबह देर से उठता दिन भर दोस्तों के साथ घूमता और रात को महफिलों में खो जाता। उसके अब्बू की नसीहतें उसके कानों से गुजर जाती थी। शहर के दूसरे किनारे पर जहां गरीबी की अंधेरी गलियां थी। एक छोटा सा घर था जो मिट्टी की दीवारों से बना था। यह नफीसा का घर था जहां वो अपने मां-बाप के साथ रहती थी। घर में सिर्फ एक कमरा था जहां एक छोटी सी खिड़की से थोड़ी सी रोशनी आती थी और फर्श पर एक सादा सी चटाई बिछी हुई थी। नफीसा के अब्बू एक छोटे से दुकानदार थे। लेकिन उनकी तबीयत खराब होने से अब वह बिस्तर पर थे। उनकी आवाज कमजोर हो गई थी और वह दिन भर दुआएं मांगते रहते। अम्मी भी बीमारी के हाथों मजबूर थी जो दिन भर खांसी और दर्द से लड़ती रहती लेकिन अपनी बेटी को प्यार से देखती। नफीसा ही घर की जिम्मेदार थी। वो अब्दुल रहमान के कारखाने में काम करती थी। जहां वो और दूसरी लड़कियां कपड़े सिलती थी। सुबह जल्दी उठती घर के छोटे से चूल्हे पर चाय बनाती। अम्मी अब्बू को खिलाती और फिर कारखाने की तरफ चल पड़ती और वह हमेशा हलाल रोजी के लिए मेहनत करती। अपने हाथों से कपड़े सिलती और घर लाती कुछ पैसे जो सिर्फ जरूरत पूरी करते थे। उसके चेहरे पर गरीबी की थकान थी। लेकिन आंखों में एक उम्मीद का नूर जो उसे जीने की हिम्मत देता था। सुबह की पहली किरण ने शहर को जगाया था और अमार अपने दोस्तों के साथ गलियों में घोड़े पर सैर कर रहा था। हवा में ठंडी लहरें थी और घोड़ों के टापों की आवाज गलियों में गूंज रही थी। अमार के दोस्त हंस रहे थे। पुराने कस्सों की बातें कर रहे थे। जब उनका रास्ता अब्दुल रहमान के कारखाने के पास से गुजरा। कारखाने से सिलाई की आवाजें और मजदूरों की बातें सुनाई दे रही थी। हवा में कपड़ों के रंगों की खुशबू घुली हुई थी। एक दोस्त ने मजाक में कहा। अमार यह तेरे अब्बू का कारखाना है। चल अंदर देखें शायद कुछ दिलचस्प मिले। कोई नया चेहरा या कुछ और। वैसे भी आज सुबह से बोर हो रहे हैं। अमार ने हंसकर सर हिलाया। उसका दिल आज कुछ नया ढूंढ रहा था। चलो देखते हैं। वैसे भी यह मजदूरों की दुनिया देखकर हंसी आएगी। घोड़े बांध लो बाहर। वो कारखाने के बड़े दरवाजे से अंदर दाखिल हुए। दरवाजा खुलते ही सिलाई की मशीनों की आवाज और मजदूरों की हलचल से भरा हॉल सामने आया। कारखाना एक बड्ढा हॉल था जहां मजदूर हाथों से काम कर रहे थे। कपड़े काटने की आवाजें, रंगों की खुशबू जो हवा में घुली हुई थी और हर तरफ मजदूर अपने काम में डूबे हुए। मर्दों का हिस्सा अलग था। जहां वह कालीन बुन रहे थे। उनके हाथ तेजी से चल रहे थे और बातें कर रहे थे। औरतों का हिस्सा पर्दे के पीछे था। जहां लड़कियां चुपचाप कपड़े सिल रही थी। उनकी सिलाई की आवाज एक रिदमम बना रही थी। अमार ने इधर-उधर देखा। उसके दोस्त मजाक उड़ा रहे थे। देख यह लोग कितनी मेहनत करते हैं। हम तो सिर्फ मजे लेते हैं। लेकिन तभी उसकी नजर एक लड़की पर पड़ी नफीसा। वो एक छोटी सी कुर्सी पर बैठी थी। अपनी सिलाई पर पूरी तवज्जो से। सर पर लाल दुपट्टा जो उसके चेहरे को हल्का सा ढांक रहा था। आंखें नीचे झुकी हुई थी और हाथ इतनी तेजी से चल रहे थे जैसे वह एक गीत गा रही हो। उसकी सादगी में एक अजीब सी कशिश थी। उसका चेहरा साफ और मासूम था जिसमें गरीबी की थकान तो थी लेकिन एक नूर भी जो अमार को रुकने पर मजबूर कर गया। वो रुक गया। अपना घोड़ा भूलकर और उसकी सिलाई देखता रहा। अमार का दिल धड़का। वो अपने दोस्त से धीरे से बोला। वो लड़की कुछ अलग है। बिल्कुल दूसरी लड़कियों से हटकर। देख उसके हाथ कितनी तेजी से चल रहे हैं। दोस्त ने कंधे उछालते हुए कहा, "अरे मजदूर लड़की है। छोड़ दे। चल बाहर। यहां की गर्मी सह नहीं जाती। लेकिन अमार की आंखें नफीसा से हट नहीं रही थी। वो उसके हाथों की हलचल देखता रहा। उसके चेहरे पर वो हल्की सी मुस्कुराहट जो काम करते हुए आई थी। उसके दिल में एक हलचल सी हुई। जैसे पहली बार कोई चीज उसके दिल को छू गई हो। उसने सोचा यह लड़की इतनी सादी लेकिन इतनी खूबसूरत क्यों लग रही है अलग? वो एक पुराने कामगार अंकल करीम के पास गया जो कारखाने का सबसे बुजुर्ग मजदूर था। उसकी दाढ़ी सफेद थी और आंखों में सालों का तजुर्बा। अंकल करीम कपड़े का एक बंडल उठा रहा था। उसके चेहरे पर पसीने की बूंदे थी। अंकल वो लड़की कौन है? लाल दुपट्टे वाली जो वहां बैठी है। अमार ने धीरे से पूछा। उसकी आवाज में एक अनजानी सी बेचैनी थी। दिल की धड़कन तेज हो रही थी। अंकल करीम ने उस तरफ देखा। फिर मुस्कुराया जैसे वो समझ गया हो। बेटा वो नफीसा है। गरीब घर की लड़की बहुत मेहनती है। रोज सुबह जल्दी आती है। बिना किसी शिकायत के काम करती है और शाम को घर चली जाती है। उसकी अम्मी अब्बू बीमारी में है। वही घर चलाती है। दीनदार लड़की है। नमाज पढ़ती है और कुरान पढ़ती है। कभी कभार मस्जिद के पास बैठकर बातें करती है अपनी सहेलियों से। अमार ने सर हिलाया लेकिन उसकी नजरें नफीसा से हट नहीं रही थी। वो चुपके से वापस गया लेकिन उस दिन के बाद उसका दिल बदल गया। रात भर वो सोचता रहा। नफीसा का चेहरा उसके ज़हन में घूमता रहा। उसकी सादगी उसके ख्यालों में बसी हुई थी। अगला दिन अमार फिर कारखाना आया। इस बार अकेला वो औरतों के हिस्से के पास चुपके से खड़ा हो गया। नफीसा को देखता रहा। नफीसा ने महसूस किया उसकी सिलाई की रफ्तार हल्की सी रुक गई। दिल में एक अनजाना सा डर जग गया। वो सोच रही थी यह लड़का क्यों रोज आता है? मालिक का बेटा है। लेकिन नजरें गलत लगती हैं। लेकिन वो नीचे देखती रही। अपने काम पर तवज्जो देती हुई। रोज यह सिलसिला चलता रहा। अमार सुबह आता चुपके से देखता उसके दिल में एक अजीब सी बेचैनी बढ़ती जाती और चला जाता। कारखाने के लोगों ने नोटिस किया मालिक का बेटा रोज आता है। वो लड़की को देखता है लेकिन कोई कुछ नहीं कहता। वो मालिक का बेटा था। नफीसा की सहेलियों ने उसे छेड़ा। काम करते हुए धीरे से नफीसा, वह अमीर लड़का रोज तुझे देखता है। क्या बात है? शायद तुझ पर फायदा हो गया। उसके चेहरे पर वो मुस्कुराहट देख नफीसा ने शर्माकर और गुस्से से कहा, चुप करो, यह सब गलत है। मैं तो बस काम करती हूं और कुछ नहीं सोचती। वो अय्याशी लड़का है। उससे दूर रहो। लेकिन अंदर से वह डरती थी। अमार की नजरें उस पर थी और वह जानती थी कि वह अय्याशी का आदि है। हर दिन काम खत्म होने के बाद वो जल्दी घर जाती। गलियों से गुजरती हुई डरते हुए पलट कर देखती। दिल में एक अनजाना सा खौफ जग गया और नफीसा का दिल बेचैन था। एक हफ्ते बाद कारखाना बंद था। सूरज डूब चुका था और शाम की हल्की सी ठंडक हवा में थी। गलियों में लोग अपने घर जा रहे थे। नफीसा अपनी सहेलियों के साथ घर जा रही थी। लेकिन वो एक छोटी सी अंधेरी गली से अकेली गुजरी ताकि जल्दी पहुंचे। उसकी सहेलियां दूसरे रास्ते चली गई थी। गली सुनसान थी। सिर्फ दूर से कुत्तों के भौकने की आवाज आती थी। और नफीसा के कदम तेज थे। दुपट्टा सर पर ठीक करते हुए। अचानक पीछे से आवाज आई। रुको नफीसा। आवाज में एक उर्फ थी जो नफीसा को रुकने पर मजबूर कर गई। उसका दिल धड़क उठा। वो डरते हुए पलटी। दिल की धड़कन तेज हो गई। हाथ ठंडे पड़ गए। अमार था। अपने घोड़े से उतर कर उसकी सांस हल्की सी तेज थी जैसे वह दौड़ कर आया हो। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी जो अंधेरे में भी दिखाई दे रही थी और चेहरे पर एक बेचैन मुस्कुराहट। तुम तुम मुझे कैसे जानते हो? नफीसा ने कांपते हुए पूछा। उसकी आवाज हल्की सी रुक गई। दिल में खौफ का तूफान उठ रहा था। अम्मार ने करीब आते हुए कहा, "मैंार हूं। अब्दुल रहमान का बेटा। मैं तुझे रोज कारखाने में देखता हूं। तुम्हारी सादगी, तुम्हारी मेहनत सब कुछ मुझे पसंद है। नफीसा तुम मुझे बहुत पसंद हो। मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं। उसके लफ्जों में जोश था, आंखें चमक रही थी। लेकिन नफीसा के लिए यह एक सदमा था। उसका चेहरा सफेद पड़ गया। नफीसा की आंखें फैल गई। वो कुछ नहीं बोली। सिर्फ भागती हुई घर चली गई। उसके कदम इतने तेज थे कि गली की धूल उड़ रही थी। दिल में एक तूफान उठ रहा था। घर पहुंचकर वह दरवाजा बंद करके रो पड़ी। अम्मी ने पूछा लेकिन वो चुप रही। उस रात वो सो नहीं सकी। ज़हन में अमार का चेहरा घूमता रहा। उसकी बातें कानों में गूंज रही थी। वो अय्याशी लड़का शादी यह सब क्या था? उसका दिल डर और हैरानी से भरा था। वो बिस्तर पर करवटें बदलती रही। दूसरे दिन नफीसा कारखाने गई, लेकिन उसका दिल धड़क रहा था। काम करते हुए उसकी नजरें बार-बार दरवाजे की तरफ जाती। डर था कि अमार आएगा। उसने सहेलियों से कहा, आज साथ चलना मेरे साथ। काम खत्म होने के बाद वो सहेलियों के साथ जा रही थी। लेकिन अमार ने उसे फिर गली के मोड़ पर रोका। उसका घोड़ा पास ही बंधा था। वो इंतजार कर रहा था। नफीसा कल तुमने मेरी बात का जवाब नहीं दिया। क्या सोचा? अमार ने मुस्कुराते हुए पूछा। लेकिन उसकी आंखों में बेचैनी थी। हाथ हल्के से कांप रहे थे। नफीसा ने गुस्से से और डर से कहा, मैं तुम्हें पसंद नहीं करती। तुम्हारे जैसे लड़के से शादी कभी नहीं। तुम अय्याशी करते हो, शराब पीते हो और मैं एक दीनदार लड़की हूं। चले जाओ यहां से वरना मैं चिल्लाऊंगी। उसकी आवाज कांप रही थी। लेकिन फैसला मजबूत था। सहेलियां हैरान खड़ी थी। अमार के चेहरे का रंग उड़ गया। वो स्टन हो गया। रिजेक्शन उसने कभी इसका तसवुर नहीं किया था। उसकी नफ्स ने उसे उकसाया दिल टूट गया लेकिन वह चुपचाप चला गया। रात भर वो सोचता रहा। गुस्सा और मोहब्बत दोनों उसके दिल में लड़ रहे थे। बिस्तर पर करवटें बदलता रहा। नफीसा के इंकार के बाद अमार का मिजाज बदल गया। उसकी नफ्स ने उसे परेशान करने का रास्ता दिखाया। अगले दिन से वह रोज कारखाना आता। नफीसा के पास चुपके से खड़ा होता और धीरे से कहता नफीसा एक बार सोच लो मैं तुझे हर खुशी दूंगा तेरे घर को दौलत से भर दूंगा नफीसा चुप रहती सिलाई पर तवज्जो देती लेकिन उसके हाथ कांप जाते दिल में डर बढ़ गया सहेलियां नोटिस करती नफीसा वो फिर आया डर मत हम तेरे साथ हैं नफीसा सोचती यह क्यों नहीं समझता मेरा दिल कितना डर रहा है एक दिन शाम को अम्मा मार ने नफीसा के घर के पास अपना घोड़ा खड़ा किया। नफीसा की अम्मी ने खिड़की से देखा। वो लड़का जो रोज इधर आता था उसकी शक्ल अम्मी को याद थी। अम्मी ने नफीसा से पूछा, बेटा यह लड़का कौन है? क्यों रोज यहां रुकता है? कोई परेशान तो नहीं कर रहा? नफीसा ने रोकर सब बताया। अम्मी वो अमार है। मालिक का बेटा मुझसे शादी करना चाहता है। लेकिन मैं मना कर दी। अब परेशान करता है, रोज देखता है, बातें करता है। अम्मी ने उसे गले लगाया। डर मत, अल्लाह पर तवकुल रख। वो तुझे हिफाजत देगा। कल अब्बू से बात करूंगी। लेकिन नफीसा की रातें बेचैन हो गई। हर आवाज पर वो चौंक जाती। घर की खिड़की से बाहर देखती। बातें यहां नहीं रुकी। अमार का गुस्सा और मोहब्बत दोनों उभर रहे थे। एक शाम नफीसा अकेली घर जा रही थी। सूरज डूब चुका था। अंधेरा छा गया था। गली सुनसान थी। सिर्फ दूर से एक कुत्ता भौंक रहा था। नफीसा के कदम तेज थे। अचानक अमार सामने आया। उसने नफीसा का हाथ पकड़ लिया। नफीसा मैं तुझसे सच में प्यार करता हूं। क्यों नहीं समझती? क्यों इंकार करती हो? उसकी आवाज में दर्द था। लेकिन जबरदस्ती भी उसकी पकड़ मजबूत थी। नफीसा ने चिल्लाकर कहा, "छोड़ो मुझे मदद। कोई सुनो। तभी एक पुराना मजदूर जो वहां से गुजर रहा था ने सुन लिया और दौड़ कर आया। छोड़ दो लड़की को। यह क्या बदतमीजी है? अमार ने हाथ छोड़ा और भाग गया। उसका दिल शर्म से भरा था। लेकिन गुस्सा भी। नफीसा रोती हुई घर पहुंची। दिल में खौफ और शर्म का तूफान था। अम्मी को बताया और रो पड़ी। अमार अब कंफ्यूज था। वो नफीसा से मोहब्बत करता था। लेकिन नफ्स उसे गलत रास्ते पर ले जा रही थी। कभी वह उसे परेशान करता। कभी चुपके से उसके लिए तोहफे भेजता। लाइक एक रेशम का दुपट्टा जो कारखाने में पहुंचा मजदूर ने दिया। कभी माफी मांगता धीरे से नफीसा माफ कर दो मैं गलत था। नफीसा का दिल टूट रहा था। वो कारखाना छोड़ना चाहती थी लेकिन घर की मजबूरी ने उसे रोक रखा था। नफीसा का डर बढ़ता जा रहा था। वो नमाज में दुआ मांगती। अल्लाह मुझे हिफाजत दे। एक दिन एक बड़ा वाकया हुआ। नफीसा कारखाने से निकल रही थी। सूरज डूब रहा था। लोग घर जा रहे थे। जब अमार ने उसे रोका। नफीसा आज जवाब दो। वरना मैं उसके लफ्ज अधूरे रह गए। एक तेज रफ्तार घोड़ा गाड़ी उसकी तरफ आई। लोग चिल्लाए बचाओ और अमार को ठोक दिया। वो जख्मी होकर जमीन पर गिर पड़ा। खून बह रहा था। दर्द से चीख निकल गई। नफीसा ने देखा उसका दिल धड़का। वो रुक गई। मजदूरों की मदद से वो अमार को हकीम के पास ले गई। उसके हाथ खून से भरे थे। वो सोच रही थी क्यों कर रही हूं मैं यह? वो मुझे परेशान करता था लेकिन इंसान तो है। हकीम के पास अमार ने आंखें खोली और नफीसा को देखा। तुम तुम यहां क्यों आई? उसने कमजोर आवाज में पूछा। दर्द से चेहरा सिकोड़ा हुआ। हाथ बंधे हुए। नफीसा ने धीरे से कहा। इंसानियत के लिए कोई भी इंसान को ऐसे नहीं छोड़ सकता। लेकिन अंदर से उसका दिल कुछ और कह रहा था। शायद एक हल्की सी रहम। वो खुद हैरान थी कि उसने अमार को क्यों बचाया। वाक्य के बाद अमार बिस्तर पर था। उसका जिस्म जख्मी था। हाथ पैर बंधे हुए थे। दर्द हर सांस के साथ महसूस हो रहा था। रात भर वो दर्द से कराहता रहा। लेकिन दिल भी टूटा हुआ था। नफीसा की मदद उसके ज़हन में घूम रही थी। अब्दुल रहमान उसके पास बैठा। उसके सर पर हाथ फेरते हुए बेटा यह अल्लाह का इशारा है। अपनी जिंदगी बदल दो। अय्याशी छोड़ दो। देख कितना दर्द सहा तूने। अम्मा सोच में डूब गया। नफरीसा का इंकार उसकी परेशानी सब गलत था। उसने सोचा मैंने उसे कितना दुख दिया और वो फिर भी मदद की। मैं गलत हूं। एक रात हकीम के इलाज के बाद उसने फैसला किया। वो 40 दिन की तबबलीगी जमात में जाएगा। एक दूर के गांव में जहां दीन की तालीम मिले और दिल साफ हो। उसने अपने अब्बू से कहा, अब्बू, मैं अल्लाह की राह पर चलता हूं। मुझे माफ कर दें। मैंने बहुत गलतियां की हैं। अय्याशी में जिंदगी बर्बाद की। अब्दुल रहमान की आंखों में आंसू आए लेकिन दिल खुश हुआ। जा बेटा अल्लाह तेरे साथ हो। यह तब्दीली तेरे लिए बेहतर है। आलिया ने रोकर अपने भाई को गले लगाया। भाई वापस आ जाना बदल कर। मैं दुआ करूंगी तेरे लिए। अमार एक गांव पहुंचा जहां जिंदगी सादा थी। मिट्टी के घर, मस्जिद के मीनार और लोग जो नमाज और जिक्र में लगे हुए थे। वहां वो सिंपल कपड़े पहने, शराब छोड़ दी। अय्याशी की यादें भूलने लगा। रोज सुबह फज्र की नमाज, दिन भर दीन की बातें और रात को जिक्र। उसका दिल धीरे-धीरे साफ होने लगा। उसकी आंखों में अब एक नया नूर था। वो सोचता नफीसा ठीक कहती थी मैं गलत था। अल्लाह मुझे माफ करे। गांव में एक बुजुर्ग आलिम थे जो जमात के लोगों को वाक्यात सुनाते। एक रात जिक्र के बाद बुजुर्ग ने एक रियल इस्लामिक वाकया सुनाया। हजरत उमर इब्न खत्ताब रज्लाहु अनू की तब्दीली की कहानी। बुजुर्ग ने कहा बेटा लोगों सुनो हजरत उमर की कहानी। वो एक सख्त दिल वाला आदमी था। मुशरिकन का सरदार जो मुस्लिमों को परेशान करता था। एक दिन वो नबी सल्लल्लाहो अलैह वसल्लम को कत्ल करने के इरादे से चला। लेकिन रास्ते में उसने अपनी बहन फातिमा और उसके शौहर को कुरान पढ़ते सुना। कुरान के लफ्जों ने उसके दिल को हिलाया। सूर ताहा की आयतें। वो अंदर गया। कुरान सुना और उसके दिल में ईमान आ गया। वो नबी के पास गए। इस्लाम कुबूल किया और इस्लाम का सबसे मजबूत सहाबा बन गए। यह तब्दीली अल्लाह की रहमत से हुई। जैसे आज तुम लोगों में हो सकती है। अमार ने यह कहानी सुनी। उसके दिल में हलचल हुई। जैसे उम्र बदले मैं भी बदल सकता हूं। उसने सोचा यह रियल वाकया उसके लिए एक मिसाल बन गया। उसने और ज्यादा जिक्र किया। गुनाहों की माफी मांगी। इधर कारखाने में दिन गुजर रहे थे। नफीसा की सहेलियां बातें कर रही थी सिलाई करते हुए। वो अय्याशी लड़का आजकल नहीं दिखता। सबीना ने कहा मुस्कुराते हुए। नफीसा ने सिलाई रोक कर पूछा क्यों कहां गया वो उसका दिल हल्का सा धड़का क्यूरियोसिटी थी फातिमा ने बताया जमात में गया है 40 दिन के लिए एक गांव में शायद बदल जाएगा एक्सीडेंट ने उसे हिलाया नफीसा हैरान रह गई उसकी आंखें फैल गई अमार जमात में उसका दिल धीरे-धीरे बदलने लगा वो सोचती शायद वह सच में बदल गया लेकिन क्या मैं उस पर भरोसा कर सकती हूं हर दिन वो उसके बारे बारे में सोचती एक हल्की सी मोहब्बत जगी लेकिन वह खुद से लड़ रही थी। 40 दिन बाद अमार वापस आया। अब वह पहले वाला अमार नहीं था। दाढ़ी बढ़ी हुई थी। सर पर टोपी और चाल में एक इंकसारी थी जो पहले कभी ना थी। उसका चेहरा सुकून से भरा था। आंखों में एक नया नूर था जैसे दिल साफ हो गया हो। वो शहर की बड़ी मस्जिद में रोज जाता। सुबह फज्र की नमाज पढ़ता और दिन भर कुरान की तिलावत करता। उसने अपने अब्बू का कारखाना भी संभालना शुरू किया। मजदूरों से अदब से बात करता। उनके काम का ख्याल रखता और अब्दुल रहमान को देखते ही खुशी होती। यह मेरा बेटा है जो अब सच का रास्ता चुन रहा है। एक दिन अमर कारखाना गया। मजदूरों ने हैरान होकर देखा। भिस्पर किए। यह मालिक का बेटा है। कितना बदल गया। अमर चुपके से नफीसा के पास गया। वो सिलाई कर रही थी। उसके हाथ अब भी तेज चल रहे थे। लेकिन चेहरे पर एक हल्का सा डर था। अमार ने धीरे से कहा, नफीसा मैं बदल गया हूं। मैंने तुझे बहुत परेशान किया। मेरे गुनाहों ने तुझे दुख दिया। माफ कर दो। मैं अब सिर्फ अल्लाह के लिए जीना चाहता हूं। और तुझसे दिल से मोहब्बत करता हूं। उसकी आवाज में सच्चाई थी। आंखें झुकी हुई थी। दिल से दिल तक बात जा रही थी। नफीसा ने उसकी आंखों में देखा। उसने वो नूर देखा। वो सच्चाई जो पहले नहीं थी। वो चुप रही लेकिन उसका दिल धड़क रहा था। उसने जवाब नहीं दिया। सिर्फ सर झुकाकर अपने काम में लग गई। अमार चला गया लेकिन उसका दिल सुकून से भरा था। वो जानता था कि नफीसा को वक्त चाहिए। अमार के पुराने दोस्त जो अब भी अय्याशी में डूबे थे उसे वापस अपनी दुनिया में खींचना चाहते थे। एक शाम जब अमार मस्जिद से निकल रहा था। कुरान का एक झूझ हाथ में लिए उसके दोस्त उसके पास आए। अमार क्या हो गया है तुझे? चल आज रात महफिल है, शराब है, नाच है। वापस अपने असली रूप में आजा। एक दोस्त ने मजाक उड़ाते हुए कहा। उसके हाथ में शराब का प्याला था। अमार ने सर झुकाया। बस वो जिंदगी छोड़ दी मैंने। अल्लाह ने मुझे नया रास्ता दिखाया। तुम भी सोचो यह जिंदगी एक दिन खत्म हो गई। दोस्त हंस पड़े। यह क्या मुल्ला बन गया? लेकिन अमार अपने रास्ते चला गया। मस्जिद की मीनार के साए में उसका दिल मजबूत था। कारखाने में नफीसा अपनी सहेलियों से बातें करने लगी। एक दिन सिलाई करते हुए उसने धीरे से पूछा, वो अम्मा अब कैसा है? सच में बदल गया? सबीना ने मुस्कुरा कर कहा, हां नफीसा वो अब बिल्कुल अलग है। रोज मस्जिद जाता है, फज्र की नमाज पढ़ता है, कुरान पढ़ता है और मालिक का कारखाना भी संभालता है। मजदूर बोलते हैं कि वह अब अदब से बात करता है। कोई अय्याशी नहीं। फातिमा ने जोड़ा। तुझे याद है कैसे वो तुझे परेशान करता था। अब वो माफी मांगने आया था ना उसकी आंखों में सच्चाई थी। नफीसा का दिल हल्का सा धड़का। वो सोचने लगी। शायद वो सच में बदल गया। शायद उसकी मोहब्बत अब पाक है। दिन गुजरते गए। अमार रोज मस्जिद जाता। कारखाने में अपने अब्बू का हाथ बटाता और नफीसा से दूरी बनाए रखता। लेकिन उसकी आंखें कभी कभार उसकी तरफ देखती। दिल में एक उम्मीद जगती। नफीसा भी उसके बारे में सोचती, उसकी सहेलियों की बातें सुनती और धीरे-धीरे उसके दिल में मोहब्बत जागने लगी। एक दिन जब वो मस्जिद के पास अपनी सहेलियों के साथ बैठी थी। उसने अमार को देखा। वो कुरान पढ़ रहा था। उसका चेहरा सुकून से भरा था। नफीसा ने सोचा यह वो अमार नहीं जो मुझे परेशान करता था। यह एक नया इंसान है। एक शाम नफीसा कारखाने से निकल रही थी। अमार वहां था। मजदूरों से बात कर रहा था। उसने नफीसा को देखा और धीरे से पास आया। नफीसा मैं जानता हूं मैंने तुझे बहुत दुख दिया। लेकिन अब मैं सिर्फ अल्लाह की राह पर चलना चाहता हूं। अगर तू मुझे माफ कर सके और अगर तेरा दिल भी कहे तो मैं तुझसे शादी करना चाहता हूं। लेकिन अल्लाह के हुक्म के साथ उसकी आवाज में एक गहरी सच्चाई थी। आंखें झुकी हुई थी। नफीसा ने उसकी आंखों में देखा वो नूर वो सच्चाई। उसने धीरे से मुस्कुरा कर कहा अमार मैं भी तुझसे मोहब्बत करती हूं लेकिन यह मोहब्बत अल्लाह की राह पर होनी चाहिए। दोनों की बातें सुनकर सहेलियां खुश हो गई। उनके चेहरों पर मुस्कुराहट थी। अब्दुल रहमान और नफीसा के मां-बाप ने खुशी से शादी की बात पक्की की। शादी मस्जिद में हुई एक सादा सी निकाह की मजलिस में जहां कुरान की तिलावत हुई और दुआएं मांगी गई। अमार और नफीसा एक दूसरे के साथ अल्लाह की राह पर चल पड़े। उनकी जिंदगी मोहब्बत, ईमान और सुकून से भर गई